सूर्य क्षितिज के नीचे उतर चुका था। दीपावली की शाम धीरे-धीरे रात में बदल रही थी। हर घर की चौखट पर दीये जगमगा रहे थे। कहीं हँसी थी, कहीं पटाखों की धमक... और इसी रोशनी के बीच एक महल के संगमरमर की चौखट पर रखा दीया अपनी लौ पर कुछ ज्यादा ही इतराता हुआ जल रहा था।
उसकी नजर सामने झोपड़ी के बाहर रखे एक छोटे-से मिट्टी के दीये पर पड़ी।
महल वाला दीया मुस्कुराया।
देखा मुझे? शुद्ध घी में जल रहा हूँ। और तुम... तुम्हारे अंदर तो ठीक से तेल भी नहीं है।
झोपड़ी का दीया शांत रहा।
महल वाला दीया फिर बोला-
"मुझे देखो! मालिक ने साफ करके सजाया है। कितनी चमक है मुझमें और तुम्हें देखो... मिट्टी से सने पड़े हो।"
झोपड़ी का दीया धीरे से बोला-
"चमक पर इतना अभिमान क्यों? हमारा काम तो एक ही है... अंधेरा दूर करना।"
महल वाला दीया हँस पड़ा और गुस्से से बोला- "तुम मुझे समझाओगे?"
झोपड़ी का दीया बोला– "लगता है तुम्हें महल का असर हो ही गया है, तुम कब से इंसानों की तरह सोचने लगे; हमें इन सब बातों से कोई लेना देना नहीं है। फिर तुम्हें क्या हुआ? ज्यादा गुस्सा और अकड़ ठीक नहीं है भाई! हमारा काम रोशनी करना है, बस वही कीजिए।"
महल का दीया तमतमाया और तेज आवाज में बोला- "तुम कौन होते हो मुझे ज्ञान देने वाले।
मेरी किस्मत देखो और अपनी देखो। मैं महल में जल रहा हूँ। लोग मुझे देखकर रुकते हैं। तुम तो झोपड़ी के कोने में पड़े हो। तुम्हारी तरफ देखने वाला कौन है?"
झोपड़ी के दीये की लौ हल्के से काँपी-
"कभी-कभी भाई... जिसे देखने वाला कोई नहीं होता, वही किसी के सबसे ज्यादा काम आ जाता है।"
महल वाला दीया ठहाका मारकर हँसा।
बड़ी गहरी बातें करने लगे हो।
झोपड़ी का दीया हल्का-सा मुस्कुराया और बोला-
"बात गहरी नहीं है... बस सोच गहरी होनी चाहिए।"
महल वाला दीया कुछ कहता, उससे पहले आसमान अचानक गरज उठा।
अगले ही पल तेज आँधी चल पड़ी।
धूल उड़ने लगी। सूखे पत्ते गलियों में दौड़ने लगे। पेड़ों की डालियाँ झुक गईं। चौखट पर सजे फूल बिखर गए और दीयों की लौ काँपने लगी।
तभी हवा का एक तेज झोंका आया।
महल वाला दीया चौखट से नीचे जा गिरा।
उसके शरीर में दरार पड़ गई। घी बाहर बहने लगा और उसकी लौ बुरी तरह डगमगाने लगी।
मालिक दौड़कर आया। उसने दीया उठाया, दरार देखी और बिना कुछ कहे उसे एक तरफ रख दिया।
उधर झोपड़ी का छोटा-सा दीया अब भी आँधी से जूझ रहा था।
उसकी लौ बार-बार झुकती। एक पल को बुझने जैसी होती और अगले ही पल फिर संभल जाती।
तभी उसका मालिक दौड़ता हुआ आया।
उसने अपने दोनों हाथ दीये के चारों ओर कर दिए।
हवा उसकी हथेलियों से टकराती रही। धूल उसके चेहरे पर पड़ती रही, लेकिन उसके हाथ अपनी जगह से नहीं हटे।
महल वाला दीया दूर पड़ा यह सब देखता रहा।
कुछ देर पहले तक उसे अपने घी, अपनी चमक और अपने महल पर नाज था।
अब उसकी लौ कमजोर थी...
और सामने वही छोटा-सा दीया था, जिसे वह अपनी औकात से छोटा समझ रहा था।
उसने देखा...
झोपड़ी का मालिक अपनी हथेलियों से उस छोटी-सी लौ को बचा रहा था, जैसे वह कोई मामूली दीया नहीं, बल्कि उसके घर की आखिरी उम्मीद हो।
महल वाले दीये की लौ काँपी।
इस बार आँधी से नहीं...
पछतावे से।
उसने धीमे से कहा—
"भाई... आज पहली बार समझ आया। तेरे पास तेल कम था, मगर कोई अपना था।"
झोपड़ी का दीया कुछ नहीं बोला।
उसकी लौ बस हवा में काँपती रही।
महल वाला दीया फिर बोला—
"मैं तुझे छोटा समझता रहा... और आज तू ही मेरे सामने सबसे बड़ा बनकर जल रहा है।"
इतना कहते-कहते उसकी लौ और मद्धम हो गई।
झोपड़ी के मालिक ने अपनी हथेलियाँ और कसकर जोड़ लीं।
आँधी बाहर थी...
लेकिन महल वाले दीये के भीतर कुछ टूट चुका था।
उसने आखिरी बार उस छोटी-सी लौ को देखा और बहुत धीमे से बोला-
"काश... मैंने तेरी रोशनी को तेरे तेल से नहीं, तेरे उजाले से पहचाना होता।"
उसकी लौ बुझ गई।
कुछ देर तक झोपड़ी का दीया अकेला जलता रहा।
बाहर आँधी अब भी चल रही थी, लेकिन उसकी छोटी-सी लौ किसी तरह टिकी हुई थी।
उसके सामने मिट्टी का घर था...
उस घर में शायद महल जैसी चमक नहीं थी, न संगमरमर की चौखट, न शुद्ध घी से भरा दीया।
लेकिन वहाँ किसी की हथेलियाँ थीं, जो उसकी रोशनी बचाने के लिए आँधी से लड़ रही थीं।
और शायद यही वह बात थी, जिसे महल वाला दीया बुझने से पहले समझ गया था।
'किसी घर में जलना बड़ी बात नहीं...
किसी के अँधेरे में उम्मीद बनकर जलते रहना ही असली रोशनी है।'
प्रिया देवांगन 'प्रियू'
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़

