कल रात बहुत तेज़ बारिश हुई थी। पूरी रात बादल गरजते रहे, बिजली चमकती रही।
शहर के पक्के मकानों में रहने वालों के लिए ये मौसम सुहाना था। खिड़की से ठंडी हवा आ रही थी, लोगों ने कंबल निकाले और चाय-पकौड़ों का लुत्फ़ लिया। पर गाँव से ज़रा हटकर, कच्चे रास्तों वाले खेतों में, ये बारिश सुहानी नहीं थी। वहाँ हर बूँद एक चिंता बनकर गिरी थी।
सुबह होते ही मंगू खेत पर गया। मंगू कोई बड़ा किसान नहीं था, बस दो बीघा जमीन थी। इसी पर उसकी पूरी दुनिया टिकी थी।
खेत की मेंड़ पर पहुँचते ही वह वहीं ठिठक गया। सामने जो देखा, तो जैसे पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गई। उसकी खड़ी धान की फसल, जो पकने वाली थी, पानी में लेटी हुई थी। बालियाँ सड़ने लगी थीं। पूरी मेहनत, पूरी उम्मीद, एक रात की बारिश बहा ले गई थी।
मंगू स्तब्ध रह गया। उसने सिर पकड़ लिया और धम्म से गीली जमीन पर बैठ गया।
उसकी आँखों के आगे एक-एक करके चित्र घूमने लगे। बच्चों की स्कूल की फीस जो पिछले महीने से बाकी थी। घर की वो छत जो हर बारिश में टपकती है, इस बार उसने सोचा था फसल बेचकर पक्की छत बनवाऊंगा। बैलों के लिए चारा, दुकानदार मुरारी का कर्ज़, और दीवाली पर बच्चों के लिए नए कपड़े... सब वायदे जो उसने किए थे, वो सब इस पानी में डूबते नजर आए।
"हाय रे मेरी किस्मत! अब बच्चों को क्या जवाब दूँगा?" वह बड़बड़ाया। कुछ देर तक वह ऐसे ही जमीन पर पड़ा रहा। हिम्मत ही नहीं हो रही थी कि उठकर घर जाए।
तभी राह से गुजरते सोहन की नजर उस पर पड़ी। सोहन गाँव में ही कपड़ों की छोटी सी दुकान चलाता था। उसने मंगू को इस हाल में देखा तो दौड़कर आया और सहारा देकर उठाया।
"अरे मंगू, क्या हुआ? जमीन पर क्यों पड़ा है?"
मंगू ने रोते हुए अपनी फसल की ओर इशारा किया। सोहन समझ गया। उसने धीरज बंधाते हुए कहा, "ईश्वर की करनी को कोई कैसे बदल सकता है, मंगू भाई। जिसने दुख दिया है, उसने कोई रास्ता भी सोचा होगा।"
सोहन ने गहरी साँस ली और बोला, "मुझे ही देख ले। मैं तो कपड़ों की दुकान चलाता हूँ। लोग कहेंगे दुकानदार को क्या दुख? पर इस बार कोई ग्राहक ही नहीं आ रहा। सारे दिन खाली बैठा बाट जोहता रहता हूँ। जितना माल उधार लाकर भरा था, सब जस का तस पड़ा है। दुकान का किराया, घर का खर्चा... सब कैसे चलेगा?"
मंगू ने आँसू पोंछते हुए कहा, "हाँ भाई, इस साल सभी का बुरा हाल है। कोई सुखी नहीं है।"
सोहन ने उसका हाथ पकड़ा, "चलो उठो, घर चलते हैं। बच्चे इंतजार कर रहे होंगे।"
मंगू धीरे से मुस्कुराया, "हाँ भाई, घर में बीवी-बच्चे हैं, तभी तो जीने की एक उम्मीद रहती है। नहीं तो किसके लिए घर जाऊँ।"
दोनों अपने-अपने घर की ओर चल दिए।
सोहन जब घर पहुँचा, तो उसका आठ साल का बेटा राहुल दौड़ता हुआ आया। उसके हाथ में एक सर्टिफिकेट था। "पिताजी, देखो! स्कूल में आज मुझे पहला इनाम मिला है।"
बेटे के चेहरे की चमक देखकर सोहन का सारा दुख जैसे पल भर के लिए गायब हो गया। वह भी मुस्कुरा उठा। उसने बेटे को गले लगा लिया।
"शाबाश बेटा!" सोहन ने कहा, "खूब पढ़ो बेटा। खूब मन लगाकर पढ़ो और किसी अच्छी कंपनी में बड़ी नौकरी करना। ये दुकानदारी में कुछ नहीं रखा। व्यापार में तो घाटा-लाभ लगा ही रहता है। नौकरी में तो महीने की तय पगार आती है, सुकून रहता है।" सोहन अपने हिसाब से अपने बेटे को सबसे सुरक्षित रास्ता बता रहा था।
अगली सुबह सोहन अपनी दुकान पर बैठा था। मौसम अब खुल चुका था, पर बाजार में अभी भी सन्नाटा था।
तभी एक ग्राहक आया। कपड़ों से वह सज्जन और पढ़ा-लिखा लग रहा था। उसने अपनी पत्नी के लिए एक साड़ी दिखाने को कहा। पर उसका चेहरा बहुत उदास था, आँखों के नीचे काले घेरे थे।
सोहन ने साड़ी दिखाते हुए जिज्ञासावश पूछ लिया, "भाई साहब, बुरा न मानें तो एक बात पूछूँ? आप बहुत दुखी लग रहे हैं। सब ठीक तो है?"
उस व्यक्ति ने एक लंबी साँस ली। बोला, "क्या बताऊँ भाई। आजकल नौकरी बचाना सबसे मुश्किल काम हो गया है। सर पर हमेशा तलवार लटकी रहती है। हर वक्त डर लगा रहता है कि बॉस निकाल न दे।"
वह कहते-कहते रुका नहीं, जैसे अंदर का सब कुछ बाहर आ रहा हो। "काम का इतना दबाव है कि बच्चों के साथ बैठकर एक वक्त का खाना भी नहीं खा पाता। रात-रात भर लैपटॉप पर काम। कभी-कभी सोचता हूँ, अगर नौकरी चली गई तो क्या होगा? बीवी-बच्चों का क्या होगा? स्कूल की फीस कैसे जाएगी? घर का किराया कहाँ से दूँगा? तुम्हारे पास तो फिर भी अपनी थोड़ी जमीन है, तुम तो खेती करके कुछ खा तो लोगे। यहाँ शहर में तो पानी भी मोल का पीना पड़ता है।"
सोहन उसे ध्यान से सुनता रहा। वह हैरान था। कल तक उसे लगता था कि नौकरी वाला आदमी सबसे सुखी है।
उसने गंभीरता से कहा, "भाई साहब, आप सही कहते हैं। इस युग में कोई भी पूरा सुखी नहीं है। सभी अपने-अपने हाल से परेशान हैं।"
तीनों की कहानी एक ही निकली।
सोहन को समझ आ गया। ये बेमौसम की बरसात जैसी ही है जिंदगी। शहर वाले के लिए यही बरसात सुहाना मौसम है, किसान के लिए आफत है, दुकानदार के लिए मंदी है, और नौकरी वाले के लिए घर से न निकल पाने की मजबूरी।
बारिश का क्या है, वह तो सब पर एक जैसी बरसती है। फर्क तो सिर्फ इस बात का है कि किसकी छत कितनी मजबूत है।
शाम को सोहन ने फिर मंगू को बुलाया। चाय पीते हुए उसने कहा, "मंगू भाई, आज एक साहब आए थे। उनकी बात सुनकर लगा कि हम अकेले दुखी नहीं हैं। चलो, तुम्हारी फसल का जो बचा है, उसे मिलकर समेटते हैं। मैं तुम्हारे बच्चों की फीस के लिए मुरारी से बात कर लूँगा।"
मंगू की आँखों में फिर से एक उम्मीद जगी। बाहर अभी भी बादल थे, पर अब वे उतने काले नहीं लग रहे थे।
डॉ० वन्दना शर्मा
नई दिल्ली


मैं अनुभूति की सम्पादकीय टीम को बधाई देना चाहती हूँ. उनके अथक प्रयास से अरुनिता सफलता के नित नये आयाम छुए. हार्दिक शुभकामनायें
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