डॉ० वन्दना शर्मा
घूँघट के पट खोल
विजय नगर का रेलवे स्टेशन। नाम बड़ा था, पर स्टेशन बहुत छोटा। पूरे दिन में दो ही गाड़ियाँ आती थीं। न चाय की दुकान, न स्टॉ…
विजय नगर का रेलवे स्टेशन। नाम बड़ा था, पर स्टेशन बहुत छोटा। पूरे दिन में दो ही गाड़ियाँ आती थीं। न चाय की दुकान, न स्टॉ…
"क्या लिखा है?" रोमिला देवी के आवाज में एक किस्म की हिचक थी। पत्र के शब्द पढ़ कर रामलाल का चेहरा पीला पड़ चुक…
एक तयशुदा संघर्ष अक्सर हमारे ही आसपास ऐसे लोग रहते हैं जिनसे हमारा कभी सामना तक नहीं होता। न हमने उन्हें देखा, न कभी …