विजय नगर का रेलवे स्टेशन। नाम बड़ा था, पर स्टेशन बहुत छोटा। पूरे दिन में दो ही गाड़ियाँ आती थीं। न चाय की दुकान, न स्टॉल। सन्नाटा इतना कि सीटी की आवाज दूर तक सुनाई देती थी।
उसी सन्नाटे में एक बेंच पर दो नए शादीशुदा जोड़े बैठे थे। दोनों दुल्हनें नई-नई, सिर से पाँव तक लाल जोड़े में, घूँघट काढ़े। चेहरा किसी ने नहीं देखा था, देख भी कैसे सकते थे, घूँघट तो आँखों तक गिरा था।
एक दुल्हन को प्यास लगी। उसने धीरे से अपने पति से कहा, "पानी।"
उसका पति बेचारा घबराया। स्टेशन पर पानी कहाँ? कोई नल भी ठीक से नहीं चलता था। वो बोला, "तुम यहीं बैठो, मैं बाहर दुकान से लेकर आता हूँ।" और वो स्टेशन के बाहर भागा।
इधर दूसरी दुल्हन को टॉयलेट जाना था। वो भी अपने पति से कहकर चली गई। बेंच पर अब अकेली बैठी रह गई पहली दुल्हन, घूँघट में, प्यास से।
तभी ट्रेन की सीटी बजी। विजय नगर में ट्रेन ज्यादा देर रुकती नहीं थी।
जैसे जैसे ट्रेन आने का समय नजदीक आ रहा था स्टेशन पर भीड़ बढ़ती जा रही थी. एक ही गाड़ी थी उस समय सबको जल्दी थी पकड़ने की. जनरल डिब्बे का हाल सब जानते ही है.जैसे ही ट्रेन लगी, भीड़ टूट पड़ी। बिना टिकट, बिना लाइन, भेड़-बकरियों की तरह एक-दूसरे को धक्का देते हुए। उस धक्का-मुक्की में इंसानियत कहाँ चली जाती है पता ही नहीं चलता। कोई गिर रहा है, कोई कुचला जा रहा है, पर सबको बस चढ़ना है।
उसी अफरा-तफरी में दूसरा दूल्हा लौटा। उसकी अपनी दुल्हन तो अभी टॉयलेट से आई नहीं थी। पर बेंच पर एक घूँघट वाली दुल्हन तो बैठी है। उसने सोचा यही मेरी है। समय कम था। उसने जल्दी-जल्दी उसका हाथ पकड़ा और कहा, "जल्दी चलो, ट्रेन छूट रही है।"
घूँघट की वजह से पहली दुल्हन भी देख नहीं पाई कि हाथ पकड़ने वाला उसका पति नहीं है। वो चुपचाप ट्रेन में चढ़ गई।
ट्रेन सीटी देकर चली गई।
पीछे रह गए दो लोग।
एक तरफ पहला पति, जो पानी लेकर आया तो देखा बेंच खाली है। उसकी घूँघट वाली दुल्हन गायब।
दूसरी तरफ दूसरी दुल्हन, जो टॉयलेट से लौटी तो देखा उसका पति और बेंच वाली दुल्हन दोनों गायब। उसका पति उसे छोड़कर चला गया था, गलत दुल्हन को लेकर।
दूसरी दुल्हन पढ़ी-लिखी और समझदार थी। वो रोई नहीं, घबराई नहीं। सीधा स्टेशन मास्टर के पास गई और बोली, "मुझे पुलिस चौकी ले चलिए।"
वहीं पुलिस चौकी में पहला पति भी पहले से बैठा अपनी पत्नी के गुम होने की रिपोर्ट लिखवा रहा था। दोनों एक-दूसरे को देखकर हैरान।
दूसरी दुल्हन ने हिम्मत से सारी बात बताई। पुलिस को सारा मामला समझ आ गया। एक घूँघट ने दो घर उजाड़ दिए थे। पुलिस ने तुरंत दो सिपाही दूसरी दुल्हन के बताए पते पर भेजे, जहाँ दूसरा दूल्हा उतरने वाला था।
उधर दूसरे गाँव में दूसरा दूल्हा घर पहुँचा। घर में शादी का माहौल। ढोलक, गीत। सबने नई दुल्हन का स्वागत किया।
फिर रस्म आई घूँघट उठाने की।
घर की बड़ी औरतों ने जैसे ही घूँघट उठाकर चेहरा देखा, घर में हंगामा हो गया।
"अरे! ये किसे उठा लाया? ये तो वो लड़की ही नहीं है!"
दूल्हा भी हक्का-बक्का। ये चेहरा तो उसने शादी में भी ठीक से नहीं देखा था, घूँघट की वजह से।
बेंच पर खड़ी पहली दुल्हन ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी। उसमें आत्मविश्वास की कमी थी। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या हुआ। वो घबराई हुई एक कोने में खड़ी थी, घूँघट पकड़े।
पर किस्मत अच्छी थी कि दूल्हे के घरवाले समझदार थे। उन्होंने दुल्हन पर चिल्लाने की बजाय प्यार से पूछा, "बेटा, डरो मत। तुम्हारा घर कहाँ है? तुम्हारा नाम क्या है?"
उन्होंने उसे पानी दिया, कुछ खाने को दिया। और अपने बेटे को डाँटा, "अपनी बीवी को कहाँ छोड़ आया है तू?"
दूल्हे के पिता ने तुरंत लड़की के बताए नंबर पर फोन लगाया।
उधर विजय नगर थाने में फोन बजा। दूसरी दुल्हन ने फोन उठाया। पता चला उसकी बहू अपने मायके में सुरक्षित है, पुलिस के साथ है।
दूसरे दूल्हे के माता-पिता ने माफी माँगी और कहा, "बेटी, माफ कर दो। हमारे बेटे से गलती हो गई। कल सुबह हम खुद तुम्हें लेने आएंगे।"
इतने में पुलिस की जीप आ गई, साथ में पहला पति और दूसरी दुल्हन।
स्टेशन पर सारा मामला सुलझ गया। दोनों दुल्हनें अपने-अपने पतियों के पास लौट आईं।
जाने से पहले पुलिस इंस्पेक्टर ने दोनों परिवारों को इकट्ठा करके एक ही बात कही,
"ऐसी प्रथा को खत्म कर देना चाहिए जिसकी वजह से समस्या हो। घूँघट करवाने से अच्छा है महिलाओं को सशक्त करो, उन्हें आत्मरक्षा सिखाओ। चेहरा ढकने से इज्जत नहीं बढ़ती, आत्मविश्वास से बढ़ती है।"
सबने सिर हिलाया। पहली दुल्हन ने पहली बार अपना घूँघट खुद ही थोड़ा पीछे किया और साफ आँखों से सबको देखा।
ट्रेन फिर सीटी दे रही थी, पर अब कोई जल्दबाजी नहीं थी।
डॉ० वन्दना शर्मा
नई दिल्ली

