7 दिसम्बर 2019 को हमें जयपुर जाना था। फ्लाइट की टिकट, होटल की बुकिंग सब एक महीने पहले ही कर दिया था। पहली बार जयपुर घूमने जा रहे थे इसलिए खुशी भी दोगुनी थी।
दिसम्बर की शुरुआत थी ठण्ड अभी अधिक नहीं थी। दिल्ली में तो 15 दिसम्बर के बाद ही ठण्ड महसूस होती है। दिसम्बर-जनवरी दो माह कड़ाके की सर्दी पड़ती है दिल्ली में। पहली बार फ्लाइट से कहीं जा रही थी। एक सप्ताह से तैयारी कर रही थी, सफर में जितना कम सामान हो, उतना ही आसान होता है सफर।
आखिर वो दिन आ ही गया सात दिसम्बर का। फ्लाइट शाम पांच बजे की थी लेकिन मैं सुबह जल्दी उठ गई। दैनिक नित्य कर्म के बाद पूजा की। घर की सफाई की और खाना बनाया। खाना खाकर मैं तैयार हो गई और इंतजार करने लगी अपने पति का, ऑफिस से आने वाले थे। अक्षरधाम मेट्रो से लगभग दो घण्टे का सफर है दिल्ली एयरपोर्ट का। दो बजे घर से निकलना था। दिल्ली के ट्रैफिक को देखते हुए हमने घर से जल्दी निकलने का निर्णय लिया। ठीक दो बजे टैक्सी आ चुकी थी। रास्ते में कई जगह जाम मिला। चार बजे हम एयरपोर्ट पर पहुंचे। जो कि बहुत सुंदर था। एक सुखद सपने जैसा। सभी औपचारिकता पूर्ण करने के बाद हमने वहां फोटो लिए, वीडियो बनाई, कुछ शॉपिंग की। जैसे ही हमारी फ्लाइट की घोषणा हुई हम अपना सामान उठा चल दिए। शायद फ्लाइट एयरपोर्ट से सटी खड़ी थी, मुझे तो पता ही नहीं चला चेकिंग करते-करते कब प्लेन के अंदर पहुंच गए। न सीढ़ियां चढ़नी पड़ी, न प्लेन दिखाई दिया, बस ऐसा लगा जैसे किसी कमरे के गेट के अंदर प्रवेश किया हो। फ्लाइट के अंदर जाकर उत्साह ठंडा हो गया क्योंकि बंद डिब्बा सा लग रहा था न तो खिड़की खुलती है, न बाहर का नजारा दिखाई देता है, इसीलिए सारे यात्री अक्सर सो ही जाते हैं वहां कोई नजारा नहीं होता देखने के लिए।
मेरी सीट खिड़की के पास थी, लेकिन खिड़की बहुत छोटी थी खिड़की से बाहर अंधेरा ही दिखाई दे रहा था क्योंकि दिसम्बर में 6 बजे ही अंधेरा हो जाता है। बहुत छोटी फ्लाइट थी समय के हिसाब से लगभग बीस मिनट बाद ही हम जयपुर पहुँच गए थे। एयरपोर्ट से बाहर निकलकर सीधे टैक्सी ली चौकी धानी के लिए, क्योंकि वहां की टिकिट पहले ही बुक की। लेकिन हमें थकान हो रही थी, घर से तो दो बजे निकले थे, काफी लंबा समय हो गया था। वह जगह भी दूर थी, आठ बजे चौकी धानी पहुँचे। बहुत सुंदर जगह थी। राजस्थानी संस्कृति से सजी, ऐतिहासिक धरोहर और विरासत को समेटे, हमारा स्वागत कर रही थी। जगह-जगह मिट्टी की खूबसूरत झोपड़ियां बनी हुई थी जिनपर सुंदर आलेखन कलाकृतियां बनी थी। बच्चों के लिए झूले थे। जयपुरी काष्ठ कला, और कपड़ों की अनेक दुकाने थी। कई जगह राजस्थानी नृत्य हो रहा था। घूमते-घूमते थक चुके थे फिर हमने राजस्थानी थाली खाई, बहुत स्वादिष्ट थी। खाना खाने के बाद आलस आने लगा फिर और घूमने का मन नहीं हुआ, होटल के टैक्सी की। होटल बहुत दूर था। आमेर के पास, क्योंकि अगली सुबह आमेर का किला देखने जाना था। करीब 12 बजे रात को होटल पहुंचे जो कि एक किले नहीं महल जैसा था सब कुछ उसी तरह सजा था जैसे पिछले समय में राजा महाराजा रहते थे। थकान बहुत थी बिस्तर पर लेटते ही नींद आ गई। सुबह सात बजे आंख खुली। नहाकर तैयार हुए नाश्ता किया और वहां से ऑटो लिया आमेर का किला देखने के लिए।
आमेर का किला अपनी भव्य वास्तुकला, कलात्मक नक्काशी और ऐतिहासिक सुंदरता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। पहाड़ी पर स्थित यह किला हिंदू और मुगल शैली का एक अनूठा संगम है। इसके भीतर बना 'शीश महल' अपनी अनमोल कांच की कारीगरी से पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देता है। मावठा झील में इस विशाल और सुनहरे किले का प्रतिबिंब इसकी खूबसूरती में चार चांद लगा देता है।
किले के प्रमुख आकर्षण
• जलेब चौक: यह किले का मुख्य प्रवेश प्रांगण है, जहाँ सूरज पोल और चांद पोल से प्रवेश होता है।
• दीवान-ए-आम और दीवान-ए-खास: आम जनता और खास मेहमानों के लिए बने दरबार कक्ष।
• शीश महल: काँच और शीशों की खूबसूरत कारीगरी वाला ऐसा महल, जहाँ एक माचिस की तीली जलाने से पूरा कमरा जगमगा उठता है।
• गणेश पोल: बेहद सुंदर और कलात्मक नक्काशी से सजा मुख्य द्वार।
• शिला देवी मंदिर: किले के भीतर स्थित प्रसिद्ध मंदिर।
• जनाना ड्योढ़ी: रानियों और महिलाओं के रहने के लिए बने विशेष कक्ष और सुहाग मंदिर।
• लाइट एंड साउंड शो: शाम के समय यहाँ किले के इतिहास पर आधारित रंगारंग प्रकाश एवं ध्वनि कार्यक्रम (लाइट एंड साउंड शो) दिखाया जाता है।
उसके बाद नाहरगढ़ का किला देखने गए जो कि बहुत ऊंचाई पर था, लेकिन बहुत सुंदर, वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण।
नाहरगढ़ का किला राजस्थान के जयपुर में अरावली पर्वतमाला की पहाड़ियों पर स्थित एक ऐतिहासिक और खूबसूरत किला है।
इसका निर्माण वर्ष 1734 में जयपुर के संस्थापक महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने करवाया था।
इस किले का मूल नाम सुदर्शनगढ़ था।
ऐसा माना जाता है कि 'नाहर सिंह भोमिया' नामक एक राजकुमार की आत्मा के कारण निर्माण में बाधा आती थी। उनकी आत्मा की शांति के लिए किले के अंदर एक मंदिर बनवाया गया और उन्हीं के नाम पर इसका नाम 'नाहरगढ़' (बाघों/शेरों का निवास) रखा गया।
• माधवेंद्र भवन: 19वीं शताब्दी में सवाई माधो सिंह ने अपनी 9 रानियों के लिए यहां 'माधवेंद्र भवन' बनवाया। इसमें रानियों के लिए 9 एक जैसे महल और ऊपर राजा का सुइट है, जो गलियारों से आपस में जुड़े हुए हैं।
• रक्षा कवच: यह किला आमेर और जयगढ़ के किलों के साथ मिलकर जयपुर की सुरक्षा व्यवस्था का एक मजबूत हिस्सा था। हालांकि, अपनी मजबूत स्थिति के कारण इस पर कभी कोई प्रत्यक्ष आक्रमण नहीं हुआ।
• सूर्यास्त और नज़ारा: यहां से पूरे जयपुर शहर और 'पिंक सिटी' का बेहद मनमोहक और जगमगाता हुआ नज़ारा दिखाई देता है। शाम के समय सूर्यास्त देखने के लिए यहां पर्यटक बड़ी संख्या में आते हैं।
जोधा अकबर, रंग दे बसंती और शुद्ध देसी रोमांस जैसी कई बॉलीवुड फिल्मों की शूटिंग इस किले में हो चुकी है|
वहां से आकर हवामहल देखा जिसमें कुछ खास नहीं था बस खिड़कियां ही खिड़कियां थी। वहीं से जयपुर प्लेटफार्म आ गए। शाम को 6 बजे नई दिल्ली के लिए ट्रेन थी। उधर से ट्रेन से वापसी आए। रात ग्यारह बजे दिल्ली पहुंचे और रिक्शा अपने घर जाकर सो गए।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

