आँखों में सपने,
नयनों में चमक,
माता-पिता की दुआओं के संग,
करियर की राह पर बढ़ने को
निकला था घर का लाड़ला।
माँ को नहीं दिखता था
कोई और विकल्प,
पिता को दिख रहा था उसमें
अपना आने वाला कल।
कोचिंग सेंटर में हुआ हादसा,
सारे सपने दिए बिखेर—
जहाँ पहले गूँजती थी हँसी,
आज वहाँ पसरा है सन्नाटा।
जहाँ पहले लोग करते थे
उसके आने का इंतज़ार,
वहीं कोई आकर दे रहा है
उसकी मृत्यु का समाचार।
जिसे पढ़ने भेजा था,
वह लौटकर न आया—
घर के चिराग को
किसने यूँ बुझाया?
कितनी भारी रही होगी
पिता पर वह घड़ी,
जब जीवन के आँगन में
मौत की दस्तक आ खड़ी।
हादसे के साथ
घर की रौनक चली गई,
पीछे रह गईं
सूनी दीवारें
और उदास बेबसी।
माँ जब उठाती है किताबें,
तो आँखें भर आती हैं—
सब कुछ तो वैसा ही है,
बस वह नहीं लौट सका,
जिसने इन्हीं किताबों में
देखे थे अपने सपने।
हँसता-खेलता घर
पल भर में हो गया सूना,
किस बदनसीब माँ का
लाड़ला यूँ छिन गया?
काश! कोचिंग सेंटरों ने
हादसों से कुछ सबक लिया होता,
तो कितने मासूम बच्चे
आज भी ज़िंदा होते।
हादसों से यदि लोग
सचमुच सबक ले लेते,
तो आए दिन छात्रों की
ज़िंदगियाँ यूँ न जातीं।
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