भाषा किसी भी समाज की आत्मा होती है। वह केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और सामूहिक चेतना की संवाहक होती है। किसी राष्ट्र की पहचान उसकी भाषा से होती है और भाषा के माध्यम से ही उसके विचार, मूल्य और संस्कार पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते हैं। किसी भाषा का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि उसे अपनाने वाली युवा पीढ़ी उससे कितना जुड़ाव महसूस करती है। हिंदी भाषा के संदर्भ में आज यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो गया है कि क्या युवा पीढ़ी हिंदी से दूर होती जा रही है या बदलते समय के साथ उसे नए रूप में आत्मसात कर रही है।
वर्तमान समय में अंग्रेज़ी भाषा को प्रगति, आधुनिकता और रोजगार से जोड़कर देखा जाता है। निजी विद्यालयों, उच्च शिक्षा संस्थानों तथा कॉर्पोरेट जगत में अंग्रेज़ी के वर्चस्व ने युवाओं के मन में यह धारणा बना दी है कि सफलता प्राप्त करने के लिए अंग्रेज़ी का ज्ञान अनिवार्य है। इसके परिणामस्वरूप हिंदी को कई बार केवल घरेलू या अनौपचारिक भाषा मान लिया जाता है। युवा वर्ग हिंदी में बोलने या लिखने में संकोच करने लगता है, जिससे भाषा के प्रति आत्मविश्वास में कमी दिखाई देती है।
शिक्षा व्यवस्था भी इस स्थिति को और जटिल बनाती है। विद्यालयों में हिंदी को प्रायः एक विषय मात्र के रूप में पढ़ाया जाता है, न कि सृजन और मौलिक चिंतन की भाषा के रूप में। परीक्षा केंद्रित पढ़ाई के कारण विद्यार्थी हिंदी साहित्य, रचनात्मक लेखन और विचारात्मक अभिव्यक्ति से दूर होते जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त सोशल मीडिया और दैनिक संवाद में बढ़ती हुई हिंग्लिश भाषा ने शुद्ध हिंदी के प्रयोग को सीमित कर दिया है, जिससे भाषा की संरचना और शब्द-संपदा प्रभावित हो रही है।
हालाँकि यह कहना उचित नहीं होगा कि युवा पीढ़ी हिंदी से पूर्णतः विमुख हो चुकी है। वास्तव में डिजिटल युग ने हिंदी भाषा के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं। आज इंटरनेट, मोबाइल और सोशल मीडिया के माध्यम से हिंदी पहले से कहीं अधिक व्यापक रूप में लोगों तक पहुँच रही है। यूट्यूब, ब्लॉग, पॉडकास्ट, वेब पोर्टल्स और सोशल मीडिया मंचों पर हिंदी में विविध विषयों पर सामग्री उपलब्ध है। युवा कंटेंट क्रिएटर हिंदी में सामाजिक, शैक्षिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विषयों पर प्रभावशाली ढंग से अपनी बात रख रहे हैं।
व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर यह देखा जा सकता है कि आज का युवा वर्ग हिंदी भाषा से भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है, परंतु व्यवहारिक स्तर पर वह कई बार उसके प्रयोग से पीछे हट जाता है। शैक्षणिक संस्थानों में विद्यार्थियों को अक्सर यह कहते हुए सुना जा सकता है कि हिंदी में विचार स्पष्ट हैं, किंतु अंग्रेज़ी में अभिव्यक्ति अधिक प्रभावशाली मानी जाती है। इसके बावजूद जब सामाजिक विषयों, साहित्यिक चर्चाओं या सांस्कृतिक आयोजनों की बात आती है, तब वही युवा हिंदी में खुलकर अपनी बात रखते हैं। यह विरोधाभास दर्शाता है कि समस्या हिंदी से दूरी की नहीं, बल्कि सामाजिक धारणा और मानसिक दबाव की है।
डिजिटल माध्यमों ने हिंदी को वैश्विक पहचान भी प्रदान की है। प्रवासी भारतीयों के साथ-साथ विदेशी पाठक और श्रोता भी आज हिंदी साहित्य, कविता और विचारधारा से जुड़ रहे हैं। ई-बुक्स, ऑनलाइन पत्रिकाएँ और ऑडियो पुस्तकों ने हिंदी को पुस्तकों और कक्षाओं की सीमाओं से बाहर निकालकर जन-जन तक पहुँचाया है। यह परिवर्तन हिंदी भाषा के भविष्य के लिए अत्यंत आशाजनक संकेत है।
ऐसे में युवा पीढ़ी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। युवाओं को यह समझना होगा कि हिंदी केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की भी सशक्त भाषा है। हिंदी में सोचने, लिखने और सृजन करने से विचारों में स्पष्टता आती है और आत्मविश्वास विकसित होता है। यदि युवा वर्ग हिंदी में लेखन, साहित्य, शोध और डिजिटल कंटेंट निर्माण को अपनाए, तो भाषा और अधिक समृद्ध हो सकती है।
इसके साथ ही समाज और शिक्षा संस्थानों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे हिंदी के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करें। हिंदी को रोजगार, तकनीक और प्रशासन से जोड़कर प्रस्तुत किया जाए, ताकि युवा यह महसूस करें कि हिंदी में भी उज्ज्वल भविष्य संभव है। भाषा के प्रति सम्मान और गवे की भावना ही किसी भाषा को जीवंत बनाए रखती है।
निष्कर्षतः, हिंदी भाषा और युवा पीढ़ी का संबंध चुनौतियों से भरा अवश्य है, परंतु निराशाजनक नहीं। यदि युवा वर्ग आत्मविश्वास के साथ हिंदी को अपनाए, उसे आधुनिक तकनीक और समय की आवश्यकताओं से जोड़े तथा रचनात्मकता के साथ आगे बढ़े, तो हिंदी केवल अतीत की धरोहर नहीं रहेगी, बल्कि भविष्य की सशक्त और जीवंत भाषा के रूप में स्थापित होगी।
श्योजी राम हवलदार
M.A. हिंदी, UGC NET

यह लेख “युवा पीढ़ी और हिंदी भाषा: चुनौतियाँ और संभावनाएँ”
जवाब देंहटाएंसमकालीन समाज की वास्तविकताओं को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करता है।
हिंदी भाषा के प्रति युवाओं की भूमिका पर यह एक सार्थक विमर्श है।