"दाई, ए दाई, एक ठन कहानी सुना दे न ओ..."
"घर के बीती सुनाँव या जग के बीती...?"
"जग के बीती सुना दे दाई..."
"तो सुन। एक ठन महानगर म एक परिवार रहिस। परिवार म दाई-ददा अउ दू झन नान-नान लइका के संग म एक झन डोकरी दाई घलोक रहिस।"
"फिर का होइस दाई ?"
"घर के मुखिया ह कछु काम-धाम नई करय अऊ दारू के नशा म जम्मो बेरा डूबे रहय। घर के नारी-परानी ह दूसर के घर म रोजी-मजूरी करके परिवार के भरण-पोषण करत रहिस।"
"अऊ कहत रहू न दाई..."
"मुखिया ह घर म कलह करय, शराब पी के अपन डौकी-लइका मन से मार-पीट करय। एतका तक कि अपन बूढ़ दाई तक के बात घलोक नई मानय..."
"फेर, का होइस दाई...?"
"लइका मन डरे-सहमे रहँय अऊ बाप के डर ले रोजेच रात म अपन दाई ले कहानी सुन-सुन के ओखर गोदी म सुत जाँय..."
"दाई, ये तो आपन घर के कहानी होगिस ओ..."
"हाँ बेटा, आज के बखत म घर-घर के एही च कहानी ए..."
मूल रचनाकार - डॉ. रामकुमार घोटड़, चुरु राजस्थान
अनुवादक - डॉ० प्रदीप कुमार शर्मा, रायपुर, छत्तीसगढ़

