"क्या लिखा है?" रोमिला देवी के आवाज में एक किस्म की हिचक थी। पत्र के शब्द पढ़ कर रामलाल का चेहरा पीला पड़ चुका था। उसने जो सपना देखा था, वो सब धरा का धरा ही रह गया। उसने अपनी आखें बंद की, पर पलके उसके आशुओं को न छुपा पा सकीं। यह तो कुछ ही दिनों की बात है, जब उसने अपनी बिटिया विदा की थी।
कुछ रोज पहले रामलाल के घर काफी चहल-पहल थी । पूरा घर ऊपर से नीचे तक सजा हुआ था । घर के दरवाजे पर सैकड़ो चप्पल-जूते थे, इस पूरे घर में सिर्फ रामलाल के कमरे में उदासी का माहौल छाया हुआ था । शादी के घर में चिंता का माहोल होना नाज़िमी था। कमरे में खाट पर सिर झुकाए बैठा रामलाल ख्यालों में डूबा हुआ नजर आ रहा था, बगल में उसकी पत्नी खाट से पैर लटकाए उसके कंधे पर हाथ रखे बैठी हुई थी । रसोई से कमरे तक बार-बार उनकी बेटी उमा की पायलों की आवाज आ रही थी । हर बार एक नया चाय का प्याला लिए उमा कमरे में दाखिल होती, उमा बस चाय के प्याले को खाट पर रखती और पल भर के अंदर वह चाय का प्याला खाली हो जाता और रामलाल के मुंह से एक शब्द इस तरह निकलता जैसे बिल्ली के डर से चूहा बिल से निकलता है ‘एक और’ । रामलाल को शराब और सिगरेट की लेट नही थी इसलिए उसने चाय का सहारा लिया हो ऐसा प्रतीत हो रहा था।
“आप इतनी चाय मत पीजिए, बस हो गया”
उसकी पत्नी रोमिला देवी ने चिंतित स्वर में कहा । पर रामलाल तो चुस्की पर चुस्की मारते जा रहा था । उसके माथे पर पसीना और मन में कई सारे ख्याल गोते लगा रहे थे । उमा फिर रामलाल के इशारे पर चाय लेकर आ रही थी, तभी रोमिला देवी ने अपना सिर उमा की तरफ करके हिलाया । उसके कदम अचानक रुक गए, पायलों की आवाज न पाकर रामलाल ने अपना सिर धीरे से उठाया । उमा ने चाय के प्याले को खाट पर रख दिया ।
“पिताजी, माँ आप कृपया चिंता मत कीजिए” उमा ने धीमी आवाज मैं कहा उसकी आंखें अपने पिता की घिसी हुई चप्पल पे टिकी हुई थी ।
रामलाल की आंखें अब उस गर्म चाय के प्याले पर जा टपकी उसने अपने हाथों को उसके पास बढ़ाना चाह की तभी बाहर से ट्रैक्टर की आवाज आई वह आवाज रामलाल के कानों में गूंज उठी, वह अचानक से खड़ा हुआ उसने अपनी पत्नी के तरफ देखा और माथे का पसीना पोछा । घर का दरवाजा खुला, रामलाल और उसकी पत्नी के पांव आहिस्ता-आहिस्ता घर के बाहर जा रहे थे । उमा किवाड़ के पीछे से उन्हें एक टक लगाए देख रही थी, सामने एक ट्रैक्टर खड़ा था, उसमें कुछ बड़े बक्से थे । सब नए । रामलाल की जेब भरी हुई थी, जब ट्रैक्टर वाले ने पैसों की मांग की तो उसकी पत्नी ने कंधे पर पकड़ मजबूत बना ली । पीछे बेटी की आंखों में नमी आ गई । रामलाल ने अपनी जेब टटोली और जीवन भर की कमाई उसकी मुट्ठी में आ गई, ट्रैक्टर वाले ने पैसे पाते ही समान उतरना चालू कर दिया ।
रामलाल के पड़ोसी और दोस्त रमाकांत प्रसाद दूसरी तरफ से सब्जी लेकर आ रहे थे । अपने मित्र को दूर से देखते ही तुरंत चले आए, रमाकांत प्रसाद वैसे तो स्वभाव से अच्छे आदमी हैं, कृषि विभाग में सरकारी नौकरी करते-करते जूता घिस गया, रिटायर होने- होने को है । घर में घुसते ही आहे, चावलों के बोडे दिखलाई पड़ते हैं । सीधी बात है, वह भूखे तो नहीं ही मारेंगे ।
“और रामलाल, कैसे हो?” रमाकांत जी ने बड़ी मुस्कान के साथ कहा, पर रामलाल की मुस्कान तो मानो उस मुट्ठी में ही थी ।
“ जी, ठीक ही हूं, बस बिटिया की शादी की तैयारी चल रही है” उसने अपने माथे के पसीने को कुर्ते के बाँह से पूछते हुए कहा ।
“तैयारी?, अरे घर सज चुका है, रिश्तेदार आ गए है, बेटी जोड़े में आने वाली है, तो अब तैयारी कैसे ?” रमाकांत ने असमंजस में पूछा ।
“हां, पर दहेज के बिना जोड़ा नहीं मिलता है, न” रामलाल ने फीकी मुस्कान के साथ कहा ।
“और कुछ भी देना है?” रमाकांत जी ने ट्रैक्टर की तरफ देखते हुए पूछा ।
“हां, कुछ पैसे भी” रामलाल ने हिचकिचाते हुए कहा ।
“क्या करोगे? दहेज तो सब देते ही हैं” रमाकांत ने रामलाल के कंधे पर हाथ रखकर, सहानुभूति देते हुए कहा ।
“अब हमारे शंकर को ही देख लो बेचारे ने अपनी पत्नी की आखिरी निशानी, सोने के कंगन तक बेच डालें केवल बेटी की विदाई के लिए” रमाकांत जी ने कहा उनके भाव से साफ जाहिर हो रहा था कि वह तो दहेज के पुजारी हो । हो भी क्यों ना ? सरकारी आदमी है, बस उनके घर बेटी नहीं बेटा है।
रामलाल ने कुछ बोला नहीं सिर्फ सिर हिलाया और दरवाजे के तरफ मुड़ गया । शायद वह नाखुश था कि उसका मित्र दहेज के विरुद्ध नहीं है । उसके कंधे झुके हुए थे मानो ट्रैक्टर का सामान उसके कमजोर कंधों पर रख दिया गया हो, फिर वह अपना पैर घसीटते हुए घर के अंदर चला गया जीवन भर की कमाई को एक क्षण में बेटी के जोड़े के लिए देते हुए रामलाल के मन में एक ही सवाल बार-बार आ रहा था ‘एक जोड़े की इतनी बड़ी कीमत ?’ उमा भी क्या करती अपने आंसू को पिता के खातिर आंखों के कोने में दबा के बस पिता की घिसी हुई चप्पल और मां के सुने हाथों को देखती रहती ।
उमा दरवाजे के पीछे से भाग के कमरे में चली गई, वहां उसने अपने पिता की टंगी हुई कमीज उतारी और उसमें से उनका बटुआ जो कि थोड़ा फट चुका था । निकाल कर उसे खोला तो सबसे ऊपर उसकी और उसके पिता की साथ में एक तस्वीर थी जब उमा ने उस तस्वीर को पलटा तो उस पर लिखा था, ‘एक दिन तू भी चली जाएगी’ यह पढ़ते ही उमा सिशकर रोने लगी उमा को जितना दुख मां पिता से दूर जाने का हो रहा था उससे ज्यादा दुख उसे अपने पिता को इस तरह देखकर हो रहा था ।
दिन बीतते देर नहीं लगती और एक दिन उमा सज के जोड़े में आ जाती है, उसे इस तरह देखकर रामलाल की आंखें भर आई उसके कंधे मानो पंख की तरह हल्के हो गए हो ।
उमा की शादी हो जाती है । वह अपने नए घर आ जाती है । रामलाल का असल धन पराया हो जाता है । उमा के विदा होते ही रामलाल अपने कर्ज को चुकाने के लिए चप्पल घिसना शुरू कर देता है, उसने अपने मित्र और पड़ोसी रमाकांत से भी कुछ कर्ज ले रखा था । वह उन्हें पैसे लौटाने के लिए अपने घर से निकलता ही है कि रमाकांत जी सामने दिख जाते हैं साफ-सुतरे कपड़े, चश्मा लगाएं, हाथों में अखबार और मिठाई का डब्बा लिए अपने घर की ओर जा रहे थे ।
“रमाकांत, ओ रमाकांत” रामलाल ने हाथ हिलाते हुए पुकार ।
“मैं तुम्हारे पास ही आ रहा था” रामलाल ने अपनी जेब टटोलते हुए कहा । रमाकांत जी रामलाल के करीब आए और रामलाल के कुछ बोलने से पहले ही उन्होंने मिठाई का डब्बा आगे कर दिया और बोले
“लो मुंह मीठा करो, रामलाल”
“क्यों?” रामलाल ने आश्चर्य से पूछा ।
“अरे, मेरे बेटे का रिश्ता पक्का हो गया है, मैं तुम्हें आज बताने ही वाला था” रमाकांत जी ने एक बड़ी मुस्कान के साथ कहा ।
“बहुत अच्छी खबर है, और सही उम्र में शादी हो जाए तो ठीक हो जाता है”
“हां, और दहेज भी बहुत दे रहे हैं” रमाकांत ने एक बर्फी का टुकड़ा रामलाल के हाथ में रखते हुए, एक अजीब सी मुस्कान के साथ कहा ।
रामलाल तो कुछ समय के लिए बिल्कुल शांत हो गया । बर्फी को देखते हुए, वह तय नहीं कर पा रहा था कि यह बर्फी शादी तय होने की खुशी में है या दहेज की लालसा में ।
“तो क्या यह सही है? तुम सरकारी आदमी हो और दहेज…..?” रामलाल ने थोड़े गंभीर स्वर में पूछा ।
“देखो भाई, रामलाल मेरी बहन की शादी में मैंने और पिताजी ने भी भारी दहेज दिया था तो पैसे तो वसूल करने पड़ेंगे, न”
रमाकांत के इस जवाब से रामलाल अंदर ही अंदर शर्मिंदा हो रहा था, उसे अपना दोस्त कहते हुए । जिस चीज ने लोगों की कमर तोड़ कर रख दी है उसे यह आदमी पूजता है, इतनी गंदी सोच ! रामलाल ने अब बिना किसी देर के अपनी जेब से पैसे निकाले और रमाकांत को दे दिए ।
“अरे, बाद में भी दे सकते थे”
“नहीं, नहीं कर्ज एक फंदे की तरह होता है जितना जल्दी छूट जाए उतना अच्छा”
फिर रामलाल से पैसे लेकर दोनों मित्र, पर सोच में एकदम भिन्न अपने-अपने रास्ते चल दिए।
कई दिन बीत गए, उमा की इज्जत अब धीरे-धीरे कम होने लगती है, जैसे-जैसे दहेज के पैसे कम हो रहे थे । उमा के कानों में अब मां पिता की मिठास नहीं बल्कि तानों की कड़वाहट सुनाई पड़ने लगती है ।
“अरे ! देखो तो इतनी सज- धज के जो बैठी है, वो पलंग तेरे बाप की नहीं है” उमा की सास ने अकड़ के बोला और अपने कमर पर लगी तिजोरी की चाभियों को ठीक करने लगी ।
उमा कुछ ना बोली और बोल भी कैसे सकती थी ससुराल में स्त्रियों की जबान कट जो जाती है । बस अपना सिर घूंघट में छुपाय आशु बहती है, शायद घूंघट की परंपरा भी इसीलिए है की महिलाएं उसमें जी भर रो पाए और किसी को पता भी ना चल पाए ।
“अरे ! बैठे-बैठे क्या देख रही है ? जा, जाके पानी ला !” सास ने रसोई की तरफ इशारा करके कहा । उमा झट से खड़ी हो गई और पानी लेने रसोई में चली गई थोड़ी देर के बाद उमा वापस आई ।
“देखले, यह गिलास भी तेरे पिता ने नहीं दिया” सास चिढ़कर बोली ।
उमा वहां से तुरंत चली गई और अपने कमरे के कोने में जा, दुबक कर रोने लगी वह और कुछ कर भी नहीं सकती थी पिता की इज्जत जो बचाने थी, वह कुछ ना बोल कर भी बहुत कुछ बोल रही थी आंसू इसके गवाह थे ।
दिन गुजरे, अब दहेज के पैसे समाप्त होने लगे और उमा के घर वालों की भूख और बढ़ने लगी ।
“कितने दिन मुफ्त में खाती रहेगी?” सास ने ताना कसते हुए कहा । पीछे से उमा के पति ने भी अपनी मां का साथ दिया, आखिर वह भी तो भूखा था । वह लोग उमा को अपने पिता से पैसे मांगने के लिए मजबूर करने लगे उसके बार-बार मना करने और कहने के बावजूद की उसके पिता के पास और पैसे नहीं है । उसका पति उसे मारता-पिटता, उसके जिस्म पर वह ताजे घाव इस बात का ब्यान देते थे।
वह अब उस घर में तिल- तिल मरने लगी । जिस्म पर घाव और आंखों में आंसू लिए वह उठती, इस सोच में की शायद यह घाव भर जाएंगे पर रात होते-होते फिर चमड़े की बेल्ट और हाथों की चमाट उसे ताजा कर देती । रोज का यही सिलसिला था ।
अब उमा भी सहन नहीं कर पा रही थी वह थोड़े-थोड़े पैसे अपने पिता से मांगने लगी पर जैसे-जैसे उमा के ससुराल वालों को पैसे मिलते उनकी भूख और बढ़ती रहती, वह लोग तो मानो दहेज के पैसों से ही जीने का ख्वाब देख रहे थे ।
एक रात उमा अपने कमरे के कोने में से उठी, उसके पायल टूटे हुए थे, बाल बिखरे हुए, आंखों से आंसू की एक धारा गाल से होकर टपक जाती, बगल में बिस्तर पर सोए उसके पति के हाथ में बेल्ट थी जिसपर खून के अनेको छिटे थे । वह कुछ बुदबुदा रही थी, पर उसकी आवाज तो मानो मर ही गई हो । पूरे घर में एक अजीब - सी खामोशी थी, जहां सारा शहर सो रहा था वही उमा उन पलो को याद कर रही थी जब उसके पिता ने उसकी शादी की बात की, वह लोग रिश्ता करने नहीं बल्कि उमा को खरीदने आए थे लड़की के पिता का घर दुकान होता है और लड़की सामान, जहां सामान और कीमत दोनों पिता ही देता है । यह सब सोचती - सोचती उमा घर के बाहर जा रही थी कुछ देर बाद वह अपने पिता के घर के सामने जा रुकी और उसने एक लंबी सांस ली फिर, चाकू की तेज चाक की आवाज पूरे इलाके में गूंज उठी ।
अगले दिन, रामलाल के घर में कोहराम मचा हुआ था । लोगों की भीड़ घर के आगे जमा थी, जमीन पर उमा की लाश पड़ी थी उसकी कलाई में से खून आंसू की तरह टपक रहा था । वह उसी जोड़े में थी जिसमें उसने विदा ली थी, उमा की सजी हुई लाश देखकर रामलाल सन्न रह गया । लाश के बगल में एक लिफाफा था रामलाल ने कापते हाथों से उस लिफाफे को उठाया उसमें एक पत्र था जिसमें उमा के शब्द थे ।
पत्र में लिखा था—--
बापू, मैं अब रो भी नहीं सकती मेरे आंसू भी खरिद लिए हैं, इन लोगों ने मेरी आवाज, जिस्म सब बिक चुका है । मैं आपके पैसों को न बचा पाई केवल आखिरी दहेज को, आपकी पल भर की कमाई मेरी मुट्ठी में होगी ।
इतना पढ़ कर तो मानो आसमान फट गया हो। रामलाल और उसकी पत्नी बिलख का रोने लगे और जब रामलाल ने उमा की मुट्ठी खोली तो उसमें कुछ पैसे थे जो उमा ने थोड़े-थोड़े करके बचाए थे । तभी लिफाफे में से बाप बेटी की वही तस्वीर निकली जिसे उमा ने बटुए से निकला था उस तस्वीर पर लिखा था ‘मैं जा रही हूं’ फिर वह तस्वीर रामलाल के हाथ से छूटकर जमीन पर गिर गई जैसे उमा की सजी हुई लाश गिरी थी ।
प्रणव राज
बिहार
