तू कुछ-न-कुछ कर पाएगा।
धीरे-धीरे इस विराट धरा पे,
तू अपनी राह बनाएगा।
पथ के काँटे भी है तेरे,
तू पथ के धूल से भर जाएगा।
हर फूल की है खुशबू तेरी,
हर फूल तेरा खिल जाएगा।
कि सभी यातनाएं लिपटेगी तुझको,
हर कहर तुझपर बरस आएगा
संघर्ष-पथ का तू अकेला मुसाफ़िर,
हर क्षण-क्षण में टकराएगा।
नहीं है स्मृतियों में शेष बचा कुछ,
नहीं इस धुंध में कुछ नज़र आएगा।
दीपक बनकर जलना है तुझको,
तू ही स्वयं की चमक लौटाएगा।
ये अभिशप्त खंडहर के दलदल तेरे,
ये तिमिर तुझे छल जाएगा।
कि तेरे कर्म के अथक प्रयास से,
ये अंधकार ढल जाएगा।
नहीं है हासिल तुझको अगर कुछ,
मन में संतोष तो रह जाएगा।
फिर आएगा एक दिन लौटकर,
कि बिन माँगे सब मिल जाएगा।
ललित प्रसाद जोशी
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छत्रपति संभाजीनगर (महाराष्ट्र)

