मनुष्य के जीवन में बड़ा महत्व रखता हूं
जन्म से मृत्यु तक उसके संग चलता हूं
पहली बोली में जब नन्हे शिशु के मुख
निकलता हूं तो मां के आंखों से खुशी बरसती है
वो भी तो मैं ही हूं
कभी अनकही बातें जब कह नहीं पाते अपनों से
पत्र में अल्फ़ाज़ बनकर मैं भावनाओं में बहता हूं
रिश्तों को बांधे रखता हूं मीठी बोली से मुख से
जब निकलता हूं
खून की नदियां भी बहीं हैं कटु वाणी से जब जब
मैं क्रोध की ज्वाला सा निकला हूं
देश को स्वतंत्रता का सूरज दिखलाने में
मैं सैनिकों का जोश बनकर हौसला बना हूं
काग़ज़ पर उतरकर जब मैं लेखक की कलम
से उसके भावों को नया आकार देता हूं
समाज को सही राह दिखाने में मील का पत्थर
बन जाता हूं
मुझमें ताकत है शत्रु और मित्र बनाने की
इंसान क्या तुमने विवेकशीलता है मेरा सही उपयोग करने की?
- कविता शर्मा

