काग़ज़ पर हम अपने जज़्बात लिखते हैं।
लेखन ही बनता है मन की सच्ची आवाज़,
चुप हों होंठ तो भी ये करता है अंदाज़।
कभी दर्द, कभी खुशियों का पैग़ाम होता है,
लेखन में हर एहसास का मुकाम होता है।
हम लिखते हैं तो विचारों को पंख मिलते हैं,
सूखे मन में जैसे नए अंकुर खिलते हैं।
लेखन से ही पहचान हमारी बनती है,
शब्दों से ही दुनिया नई-नई सजती है।
हम और लेखन का रिश्ता बड़ा गहरा है,
यही हमारी सोच का सबसे सच्चा चेहरा है।
कविता शर्मा

